भारत की मिट्टियाँ (अध्याय -33 भारत का भूगोल )

भारत की मिट्टियाँ (अध्याय -33 भारत का भूगोल )

भारत कृषि अनुसंधान परिषद ( मुख्यालय – नई दिल्ली) ने भारत में आठ तरह की मिट्टियों की पहचान की है।
1- पर्वतीय मिट्टी
2- जलोढ़ मिट्टी
3- काली मिट्टी
4- लाल मिट्टी
5- लैटेराइट मिट्टी
6- मरुस्थलीय मिट्टी
7- पीट एवं दलदली मिट्टी
8- लवणीय एवं क्षारीय मिट्टी

– भारतीय मृदा विज्ञान संस्थान – भोपाल में

(Indian institute of soil science)
भारत में सर्वाधिक क्षे० पर पाई जाने वाली मिट्टी क्रमानुसार
1- जलोढ़ मिट्टी – 43 %

भारत के सभी मिट्टियों में तीन तत्वों की कमी पाई जाती है।

1- ह्यूमस
2- नाइट्रोजन
3- फास्फोरस

जलोढ़ मिट्टी

– जलोढ़ मिट्टी को कॉप या  कद्दारी मिट्टी भी कहते हैं।
– यह भारत के सर्वाधिक क्षेत्रफल 43% पर विस्तृत है।
– यह भारत में मुख्य रूप से दो क्षेत्रों में पाई जाती है।
1- उत्तर भारत के मैदान में
2- तटीय क्षेत्रों में
– उत्तर भारत के मैदान में जलोढ़ मिट्टी सतलज के मैदान से लेकर पूर्व में ब्रम्हपुत्र के मैदान तक मिलता है।
– तटीय मैदान के अंतर्गत जलोढ़ मिट्टी महानदी, गोदावरी, कृष्णा, कावेरी नदियों के डेल्टा क्षेत्र में और पश्चिमी तटीय मैदान के अंतर्गत केरला और गुजरात में पाई जाती है।
– जलोढ़ मिट्टी नदियों के द्वारा पहाड़ों को काटकर लाई गई है तथा मैदानों में बिछा दी गई है।

– जलोढ़ मिट्टी दो प्रकार के होते हैं।

1- खादर
2- बांगर
– नदी के आसपास बाढ़ क्षेत्र की जलोढ़ मिट्टी खादर मिट्टी कहलाती है। खादर मिट्टी हर साल नई हो जाती है बाढ़ के माध्यम से
– नदी से दूर ऊंचे क्षेत्रों के पुराने जलोढ़ को बांगर मिट्टी कहते हैं।
बांगर मिट्टी हर साल नहीं नहीं होती है अतः खादर मिट्टी अपेक्षाकृत अधिक उपजाऊ होता है।

– भारत के सभी मिट्टियों में सर्वाधिक उपजाऊ जलोढ़ मिट्टी है तथा जलोढ़ मिट्टी में खादर मिट्टी सर्वाधिक उपजाऊ है।

– बांगर क्षेत्र की मिट्टी में खुदाई करने पर कैल्शियम कार्बोनेट या चूना की ग्रंथियां मिलती हैं।
यह ग्रंथियां हिमालय क्षेत्र को काटकर नदियों द्वारा लाई गई हैं तथा इन्हें नई मिट्टियों के द्वारा ढक दिया गया है।
इन्हें स्थानीय भाषा में ककड कहा जाता है।
– जलोढ़ मिट्टी में भी ह्यूमस, नाइट्रोजन और फास्फोरस की कमी पाई जाती है।
– जलोढ़ मिट्टी में पोटेशियम और चूना प्रचुर मात्रा में पाया जाता है।

लाल मिट्टी

– भारत में दूसरा सर्वाधिक क्षेत्र 18% में पाया जाने वाला मिट्टी लाल मिट्टी है।
– लाल मिट्टी लोहे के ऑक्साइड के कारण लाल दिखाई देता है।
लोहा का ऑक्सीकरण हो जाता है अर्थात लोहा जब खुला में रहता है तो वह ऑक्सीजन और नमी के संपर्क में आ जाता है जिसके कारण लोहा में जंग लग जाता है। यह जंग लोहा का ऑक्साइड कहलाता है।
– दक्षिण भारत में या पठारी भारत के सर्वाधिक क्षेत्रफल पर लाल मिट्टी पाया जाता है।
– पठारी भारत का आधा पूर्वी भाग लाल मिट्टी का क्षेत्र है तथा आधा पश्चिमी भाग काली मिट्टी का क्षेत्र है।
– लाल मिट्टी पठारी भारत के पूर्वी भाग तथा पूरे दक्षिण भारत में पाया जाता है। इसका विस्तार मुख्य रूप से तमिलनाडु, तेलंगाना, आंध्र प्रदेश, छत्तीसगढ़ उड़ीसा, पूर्वी मध्य प्रदेश तथा झारखंड में है लेकिन लाल मिट्टी का सर्वाधिक क्षेत्रफल तमिलनाडु में है।
– लाल मिट्टी पठारी भारत के कम वर्षा वाले क्षेत्रों की मिट्टी हैं। यह उपजाऊ मिट्टी नही है, यही कारण है कि खाद्यान्नों की खेती यहाँ कम होती हैं।

काली मिट्टी

– काली मिट्टी का विस्तार महाराष्ट्र, गुजरात, मध्य प्रदेश तथा उत्तरी कर्नाटक के क्षेत्र तक है। दक्षिण पूर्वी राजस्थान
– काली मिट्टी में कपास की खेती अधिक होती है इसलिए इसे कपासी मिट्टी कहते हैं।
– कपासी, रेगुर लावा मिट्टी, करेल मिट्टी उत्तर प्रदेश में करेल मिट्टी को काली मिट्टी कहा जाता है।
– अंतरराष्ट्रीय स्तर पर काली मिट्टी को चेरनोजम कहा गया है। चेरनोजम मिट्टी मुख्य रूप से काला सागर के उत्तर में यूक्रेन में तथा ग्रेट लेक्स के पश्चिम में संयुक्त राज्य अमेरिका और कनाडा में पाई जाती है।
– काली मिट्टी को लावा मिट्टी भी कहते हैं क्योंकि यह दक्कन ट्रैप के लावा चट्टानों की अपक्षय अर्थात टूटने फूटने से निर्मित हुई मिट्टी है।
– दक्कन पठार के अलावा काली मिट्टी मालवा पठार की भी विशेषता है अर्थात मालवा पठार पर भी काली मिट्टी पाई जाती है।
– काली मिट्टी का सर्वाधिक विस्तार महाराष्ट्र राज्य में है।
– काली मिट्टी की प्रमुख विशेषता यह है कि उसमें जल धारण करने की सर्वाधिक क्षमता होती है काली मिट्टी बहुत जल्दी चिपचिपी हो जाती है तथा सूखने पर इस में दरारें पड़ जाती हैं इसी गुण के कारण काली मिट्टी को स्वत जुताई वाली मिट्टी कहा जाता है।
– कपास की खेती सर्वाधिक गुजरात राज्य में होती है अर्थात कपास का उत्पादन सर्वाधिक गुजरात राज्य में होता है।

शुष्क कृषि

– जिन क्षेत्रों में वर्षा कम होती है {जैसे – राजस्थान वृष्टि छाया प्रदेश का क्षेत्र} वहां खेती की एक विशेष पद्धति अपनाई जाती है जो जल बचत पर आधारित होती है।
ऐसे कृषि में पानी सीधे पौधों को ही मिलती है।
– किसान बरसात से पहले खेतों की जुताई इसलिए करते हैं ताकि मिट्टी बरसात के समय अधिक से अधिक नमी अर्थात जल धारण कर सके।

लैटेराइट मिट्टी

– लैटेराइट मिट्टी का निर्माण दो परिस्थितियों में होता है।
1-  200 सेंटीमीटर से अधिक वार्षिक वर्षा
2-  अधिक गर्मी

उपरोक्त दोनों परिस्थिति भारत के तीन क्षेत्रों में पाई जाती है।

1- पश्चिमी घाट पर
2- उड़ीसा तट पर
3- शिलांग पठार पर
भारत में लैटेराइट मिट्टी का सर्वाधिक क्षेत्रफल केरला में है।
तथा इसके बाद महाराष्ट्र में पाया जाता है।
क्योंकि इन दोनों राज्यों में पश्चिमी घाट के पश्चिमी ढाल के सहारे 200 सेंटीमीटर से अधिक वार्षिक वर्षा दर्ज की जाती है और साथ ही विषुवत रेखा से नजदीक होने के कारण इन क्षेत्रों में गर्मी अधिक पड़ती है।

– भारत में लैटेराइट मिट्टी का विस्तार

1- पश्चिमी घाट
2- तमिलनाडु की शिवाराय पहाड़ी
3- उड़ीसा का तट
4- झारखंड के राजमहल पहाड़ी
5- मेघालय एवं असम की पहाड़ियां अर्थात मेघालय के शिलांग पठार एवं असम के मिकीर रेंगमा पहाड़ी पर

– लैटेराइट मिट्टी भारत में चौथा सर्वाधिक क्षेत्रफल पर विस्तृत मिट्टी है।

– ईट बनाने के लिए सर्वाधिक उपयुक्त मिट्टी लैटेराइट मिट्टी है।
– लैटेराइट मिट्टी में ह्यूमस, नाइट्रोजन, फास्फोरस और पोटाश (k) की कमी पाई जाती है।
– लैटेराइट मिट्टी में लोहे और एल्यूमीनियम के ऑक्साइड की प्रचुरता होती है और लोहे के ऑक्साइड के कारण ही लैटेराइट मिट्टी का रंग लाल होता है।
– इन क्षेत्रों में अधिक वर्षा के कारण तथा क्रम से भीगने एवं सूखने के कारण इन क्षेत्रों की मिट्टियों में सिलिका पदार्थ का निक्षालन हो गया है अर्थात सिलिका पदार्थ रिस कर नीचे की ओर चला गया है।
अर्थात लैटेराइट मिट्टी का निर्माण सिलिका के निक्षालन से हुआ है।

– लैटेराइट मिट्टी एक निक्षालित मिट्टी है।

–  लैटेराइट मिट्टी की उपजाऊ मिट्टी है इसलिए या खानदान की लैटेराइट मिट्टी की उपजाऊ मिट्टी है इसलिए या खाद्यान्न की खेती के लिए उपयुक्त नहीं है।
यहां पर चाय, कॉफी, मसाला, काजू, चीनकोना की खेती होती है।
यह मिट्टी अम्लीय होती है।

मरुस्थलीय मिट्टी

– मरुस्थलीय मिट्टी का निर्माण पश्चिमी भारत के शुष्क क्षेत्रों में हुआ है राजस्थान तथा राजस्थान के आसपास के राज्यों में।
– इसका विस्तार भारत में दक्षिणी पंजाब, दक्षिणी हरियाणा, समग्र राजस्थान तथा गुजरात के कच्छ क्षेत्र में है।
– इसका मिट्टी में खाद्यान्नों की खेती संभव नहीं है इसलिए यहां पर ज्वार, बाजरा, सरसों एवं मोटे अनाज की खेती की जाती है।
– ज्वार, बाजरा, सरसों एवं मोटे अनाज उत्पादन में राजस्थान सबसे आगे है क्योंकि मरुस्थलीय मिट्टी का सर्वाधिक क्षेत्रफल राजस्थान में है।
– राजस्थान के गंगानगर जिला जहां से इंदिरा गांधी नहर के माध्यम से सिंचाई की सुविधा उपलब्ध कराई गई है वहां पर खाद्यान्नों की खेती भी की जाती है।
– हरित क्रांति के क्षेत्रों में राजस्थान का श्रीगंगानगर जिला भी शामिल था। {गेहूं}
– पंजाब में हरि के नाम के स्थान पर व्यास नदी सतलज से मिलती है इनके मिलन स्थान पर पोंग नामक बांध बनाकर इस बांध से इंदिरा गांधी नहर निकालकर राजस्थान की ओर ले जाया गया है तथा इस नहर से राजस्थान के 7 जिलों की सिंचाई की जाती है।

पर्वतीय मिट्टी

– पर्वतीय मिट्टी भारत में हिमालय के साथ-साथ पाई जाती है इस कारण जम्मू कश्मीर, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, सिक्किम और अरुणाचल प्रदेश में पाई जाती है।
– चुकी हिमालय पर वनस्पतियों एवं जीवों की प्रचुरता है इसी कारण हिमालय के पर्वतीय मिट्टी में ह्यूमस की प्रचुरता पाई जाती है।
– ह्यूमस की अधिकता के कारण पर्वतीय मिट्टी में अम्लीयता के गुण आ गए हैं जिसके कारण यहां सेब, नासपाती एवं चाय की खेती होती है।

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