भारत के संवैधानिक विकास का इतिहास (bharat ka samvaidhanik vikas)

भारत के संवैधानिक विकास का इतिहास


किसी भी देश के संविधान की रचना मात्र एक दिन की उपज नहीं होती है। संविधान एक सतत् विकास का परिणाम होता है। भारतीय संविधान के ऐतिहासिक विकास का काल सन् 1599 ई. से शुरू होता है तथा उसी समय ब्रिटेन में ईस्ट इंडिया कंपनी की स्थापना भी हुई थी।

ईस्ट इंडिया कंपनी की स्थापना 1599 ई. में हुई। महारानी एलिजाबेथ ने एक राजलेख द्वारा 15 वर्षों के लिए व्यापार का अधिकार दिया, जिसे 1599 ई. का चार्टर कहा जाता है।

इस राजलेख द्वारा कंपनी को समस्त पूर्वी देशों में व्यापार का एकमेव स्वामित्व सौंपा गया। तथा कंपनी की समस्त शक्तियां 24 सदस्यीय परिषद में निहित थी।

1726 के राजलेख द्वारा कलकत्ता, बंबई तथा मद्रास प्रेसीडेन्सी के गवर्नरों को विधि बनाने की शक्ति सौंपी गयी।

1726 के राजलेख द्वारा कलकत्ता, बंबई तथा मद्रास प्रेसीडेन्सी के गवर्नरों को विधि बनाने की शक्ति सौंपी गई।

1726 के चार्टर के द्वारा भारत स्थित कंपनी को नियम, उपनियम तथा अध्यादेश जारी करने की शक्ति प्रदान की गयी।

1773 का रेग्युलेटिंग एक्ट
पिट्स इंडिया एक्ट 1784
1786 का अधिनियम
पिट ने 1786 का अधिनियम पारित करवाया। जिसका प्रमुख उद्देश्य कार्नवालिस को भारत के गवर्नर जनरल के पद के लिए तैयार करना था। इस अधिनियम के तहत मुख्य सेनापति की शक्तियां भी गवर्नर जनरल में निहित कर दी गयी।

1793 का चार्टर एक्ट
1793 में एक चार्टर एक्ट पारित किया गया, जिसके द्वारा कंपनी के व्यापारिक अधिकारों को 20 वर्ष के लिए बढा दिया गया।

1813 का चार्टर एक्ट
समकालीन यदभाव्यम् के सिद्धांत तथा अंग्रेजों के यूरोपीय व्यापार बंद होने के कारण से कंपनी के व्यापारिक अधिकार को समाप्त करने के लिए 1813 का चार्टर एक्ट लाया गया।

इसलिए 1813 के चार्टर एक्ट के द्वारा कंपनी के भारतीय व्यापार के एकाधिकार को समाप्त कर दिया गया।

1833 का चार्टर एक्ट की विशेषताएँ क्या थी
1833 के चार्टर एक्ट पर, इंग्लैंड की औद्योगिक क्रांति,उदारवादी नीतियों का क्रियान्वयन तथा लेसेज फेयर के सिद्धांत की छाप थी।

नियंत्रण बोर्ड के सचिव मेकाले तथा बेन्थम के शिष्य जेम्स मिल का प्रभाव 1833 के चार्टर एक्ट पर स्पष्ट रूप से प्रतिध्वनित होता है।

इस एक्ट ने कंपनी को अगले 20 वर्षों के लिए नया जीवन दिया। तथा उसे एक ट्रस्टी के रूप में प्रतिष्ठित किया।

कंपनी के वाणिज्यिक अधिकार समाप्त कर दिये गये, तथा उसे भविष्य में केवल राजनैतिक कार्य ही करने थे।

इस अधिनियम के द्वारा भारतीय प्रशासन का केन्द्रीयकरण कर दिया गया।बंगाल का गवर्नर अब भारत का गवर्नर जनरल बना दिया गया।

इस अधिनियम ने कंपनी के डायरेक्टरों के संरक्षण को कम किया।

परिषद गवर्नर जनरल को कंपनी के सैनिक तथा असैनिक कार्य का नियंत्रण निरीक्षण तथा निर्देशन सौंपा गया।

इस अधिनियम द्वारा भारत में दासता को अवैध घोषित किया गया।

सभी कर परिषद गवर्नर- जनरल की आज्ञा से ही लगाये जा सकते थे। इस प्रकार प्रशासन तथा वित्त की सारी शक्ति गवर्नर जनरल और उसकी परिषद् में केन्द्रित हो गयी।

इस अधिनियम के द्वारा कानून बनाने के लिए गवर्नर-जनरल की परिषद में एक कानूनी सदस्य चौथे सदस्य के रूप में सम्मिलित किया गया।

सर्वप्रथम मेकाले को विधि सदस्य के रूप में गवर्नर जनरल की परिषद में सम्मिलित किया गया।

केवल परिषद गवर्नर-जनरल को ही भारत के लिए कानून बनाने के अधिकार प्राप्त थे।

भारतीय कानूनों को संचित लिपिबद्ध तथा सुधारने के उद्देश्य से एक विधि आयोग का गठन किया गया।

इस अधिनियम के द्वारा कंपनी के चीनी व्यापार तथा चाय संबंधी व्यापार के एकाधिकार को समाप्त कर दिया गया।

गवर्नर-जनरल को ही विधि आयुक्त नियुक्त करने का अधिकार प्रदान किया गया।

इस अधिनियम के द्वारा नियुक्तियों के लिये योग्यता संबंधी मापदंड को अपना कर, भेदभाव समाप्त कर दिया गया।

1853 का चार्टर एक्ट
इस चार्टर ने कार्यपालिका तथा विधायी शक्तियों को पृथक करने का एक निश्चित कदम उठाया। भारत वर्ष के लिए एक पृथक विधान-परिषद की स्थापना की गयी।

विधान परिषद में 12 सदस्य होते थे। कमान्डर-इन-चीफ, गवर्नर-जनरल, गवर्नर-जनरल के चार सदस्यों में बंगाल के मुख्य न्यायाधीश , कलकत्ता सुप्रीम कोर्ट का एक न्यायाधीश और बंगाल-मद्रास, कलकत्ता सुप्रीम कोर्ट का एक न्यायाधीश और बंगाल-मद्रास, बंबई और आगरा चार प्रांतों के प्रतिनिधि शामिल थे।

इस प्रकार भारतीय विधान परिषद में सर्वप्रथम क्षेत्रीय प्रतिनिधित्व का सिद्धांत पारित किया गया।

विधान परिषद द्वारा पारित विधेयकों को गवर्नर-जनरल वीटो कर सकता था।

विधि सदस्य को गवर्नर-जनरल की कार्यकारिणी का पूर्ण सदस्य बना दिया गया।

परिषद में वाद-विवाद का प्रारूप मौखिक था। परिषद का कार्य गोपनीय नहीं सार्वजनिक प्रकृति का था।

1853 के अधिनियम ने ही सर्वप्रथम संपूर्ण भारत के लिए एक-विधान मंडल की स्थापना की।

इस अधिनियम ने कंपनी डायरेक्टरों से नियुक्ति संबंधी अधिकार वापस ले लिया, जिससे डायरेक्टरों का संरक्षण भी समाप्त हो गया।

1858 का अधिनियम
कंपनी की दोहरी शासन-व्यवस्था को समाप्त करने के लिए 1858 में ब्रिटिश सरकार ने एक अधिनियम पारित किया।

इस अधिनियम को – 1858 – एक्ट फॉर दी बेटर गवर्नमेंट आफ इंडिया की संज्ञा से नामित किया।

1858 के अधिनियम ने भारत के शासन को कंपनी के हाथों से निकाल कर सम्राट को सौंप दिया।

भारत का प्रशासन अब साम्राज्ञी द्वारा नियुक्त 15 सदस्यीय एक परिषद को सौंप दिया गया, जिसका अध्यक्ष मुख्य राज्य सचिव या भारत-राज्य -सचिव के नाम से विभूषित किया गया।

राज्य सचिव को उस समय तक डायरेक्टर्स के बोर्ड तथा नियंत्रण बोर्ड, दोनों बोर्डों की संयुक्त शक्तियां मिल गयी।

इस प्रकार 1784 के पिट्स इंडिया एक्ट द्वारा लागू द्वैध शासन प्रणाली समाप्त कर दी गयी।

राज्य सचिव की 15 सदस्यीय परिषद में से 8 की नियुक्ति क्राउन के द्वारा तथा 7 की डायरेक्टर्स के बोर्ड द्वारा होनी थी।

अधिनियम में एक महत्त्वपूर्ण व्यवस्था यह थी, कि इन सदस्यों में से कम से कम आधे ऐसे लोग हो जो भारत में 10 वर्ष तक सेवा कर चुके हों।

परिषद की भूमिका केवल परामर्शदाता की थी, कि इन सदस्यों में से कम से कम आधे ऐसे लोग हो, जो भारत में 10 वर्ष तक सेवा कर चुके हों।

परिषद की भूमिका केवल परामर्शदाता की थी और प्रायः बहुत से मामलों में राज्यसचिव का निर्णय ही अंतिम हो सकता था।

भारत के गवर्नर-जनरल को अब वायसराय की उपाधि मिली, जो क्राउन का सीधा प्रतिनिधि था।

राज्य-सचिव को एक विकास निगम घोषित किया गया।

राज्य-सचिव ब्रिटिश मंत्रिमंडल का सदस्य होता था, इसलिए वह ब्रिटिश संसद के प्रति उत्तरदायी था।

कन्वेन्टेड सिविल सेवा में नियुक्तियां खुली प्रतियोगिता द्वारा की जाने लगी, जिसके लिए राज्य सचिव ने सिविल सर्विस कमिश्नर की सहायता से नियमों की उत्पत्ति की।

1861 का अधिनियम
विधि- निर्माण की त्रुटिपूर्ण प्रणाली वाइसराय की निषेधात्मक शक्ति (Veto power) तथा विधान परिषद में भारतीयों का न के बराबर प्रतिनिधित्व आदि कारणों ने 1861 के भारत परिषद अधिनियम की पृष्ठभूमि तैयार की।

ब्रिटिश सरकार ने उपरोक्त कमियों को दूर करने के लिए 1861 का भारत परिषद अधिनियम पारित किया।

सन् 1861 के अधिनियम ने भारत में प्रतिनिधि संस्थाओं को जन्म दिया।

वाइसराय की कार्यकारिणी परिषद में एक पांचवा सदस्य शामिल किया गया, जो कि एक विधिवेत्ता का पद था।

वाइसराय की परिषद को कानून बनाने की शक्ति प्रदान की गयी, जिसके तहत लार्ड कैनिंग ने विभागीय प्रणाली की शुरूआत की।

लार्ड कैनिंग ने विभागीय प्रणाली की शुरूआत की।

लार्ड कैनिंग ने भिन्न-2 सदस्यों को अलग-2 विभाग सौंप कर एक प्रकार से मंत्रिमंडलीय व्यवस्था की नींव डाली।

इस व्यवस्था के अनुसार प्रशासन का प्रत्येक विभाग एक व्यक्ति के अधीन होता था।

वाइसराय की विधान परिषद के सदस्यों की संख्या बढा दी गयी।न्युनतम संख्या 6 और अधिकतम संख्या 12 निर्धारित की गयी।

इनको वायसराय मनोनीत करेगा तथा इनकी अवधि 2 वर्ष तक के लिए रखी गयी।

इन नामांकित सदस्यों में से आधे सदस्य गैर सरकारी सदस्य होते थे। इनका कार्यकाल दो वर्ष का होता था।

विधान परिषद की शक्ति अत्यंत सीमित थी। सदस्यों को प्रशासन अथवा वित्त संबंधी प्रश्नों को पूछने का कोई अधिकार नहीं था।

वाइसराय का संकटकालीन समय में विधान परिषद की सलाह के बिना ही अध्यादेश जारी करने की अनुमति प्राप्त थी।

इस अध्यादेश की क्रियाशीलता को केवल 6 मास के लिए निर्धारित किया गया।

वाइसराय को विधान परिषद द्वारा पारित विधियों को वीटो करने की शक्ति प्राप्त थी।

ब्रिटिश संसद किसी भी विधि को अस्वीकृत कर सकती थी।

इस अधिनियम के अनुसार बंबई या मद्रास प्रांतों की परिषदों को अपने लिए कानून तथा उनमें संशोधन का अधिकार दे दिया गया।

तथापि इनकी वैधता वाइसराय की अनुमति पर ही निर्भर थी।

इस अधिनियम के द्वारा वाइसराय को नये प्रांतों की स्थापना तथा उनकी सीमाओं में परिवर्तन का अधिकार भी प्राप्त हो गया।

1892 का भारत परिषद अधिनियम
1857 की राज्य क्रांति के फलस्वरूप भारतीयों में पनपी राष्ट्रीयता,1885 में कांग्रेस की स्थापना तथा इल्बर्ट बिल विवाद आदि घटनाओं ने 1892 के भारत परिषद अधिनियम पारित करने के लिए अंग्रेजों को बाध्य किया।

इस अधिनियम द्वारा केन्द्रीय तथा प्रांतीय विधान परिषदों की सदस्य संख्या में वृद्धि की गयी।

वाइसराय विधान परिषद में न्यूनतम 10 तथा अधिकतम सदस्य संख्या 16 निर्धारित की गयी।

वाइसराय को सदस्यों के नामांकन का अधिकार सुरक्षित रखा गया।

परिषद के भारतीय सदस्यों को वार्षिक बजट पर बहस करने तथा सरकार से प्रश्न पूछने का अधिकार भी दिया गया।

प्रांतीय विधानमंडलों को बंबई तथा मद्रास में इस अधिनियम द्वारा न्यूनतम 8 तथा अधिकतम 20 अतिरिक्त सदस्यों द्वारा बढा दिया गया।

इन सदस्यों को सार्वजनिक हित के मामलों में 6 दिन की सूचना देकर प्रश्न पूछने का भी अधिकार दिया गया।यह केन्द्रीय तथा प्रांतीय दोनों विधान मंडलों के लिए यह व्यवस्था थी।

परंतु यदि प्रशासन आवश्यक समझे तो बिना कारण बताये प्रश्नों का उत्तर देने से मना कर सकती थी।

इस अधिनियम का सबसे महत्त्वपूर्ण प्रावधान चुनाव पद्धति की शुरूआत करनी थी।

केन्द्रीय विधानमंडल में अधिकारियों के अतिरिक्त 5 गैरसरकारी सदस्य होते थे, जिन्हें चारों प्रांतों के विधान मंडलों के गैर सरकारी सदस्य तथा कलकत्ता के वाणिज्य मंडल के सदस्य निर्वाचित करते थे।तथा अन्य 5 गैर सरकरी सदस्यों को वायसराय मनोनीत करता था।

भारतीय विधान मंडल के सदस्यों नगर पालिकायें जिला बोर्ड,विश्वविद्यालय तथा वाणिज्य मंडल निर्वाचित करते थे।

निर्वाचन की पद्धति पूर्णतया अप्रत्यक्ष थी तथा निर्वाचित सहस्यों को मनोनीत की ही संज्ञा दी जाती थी।

इस अधिनियम में चुनाव प्रणाली को तो स्वीकार किया गया था, परंतु स्पष्ट ढंग से नहीं। विधानमंडलों की शक्तियां बहुत सिमित थी, सदस्यों को अनुपूरक प्रश्न पूछने का अधिकार नहीं था।

चुनाव की विधियां संतोषजनक नहीं थी। सिद्धांत रूप में हम केवल यही कह सकते हैं, कि यह अधिनियम अखिल भारतीय कांग्रेस की मांगों से काफी कम था। फिर भी एक सकारात्मक प्रयास था।

1909 को भारतीय परिषद एक्ट अथवा मार्ले-मिण्टो सुधार
1919 का भारत सरकार अधिनियम (मॉण्ट-फोर्ड सुधार)
भारत शासन अधिनियम 1935
भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम 1947

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